कोई आये रे।
रंग दे चुनरिया
लाल धानी या केसरिया
मेरे देश की।
धरती नभ् की पिचकारी से रंग फिसलकर आए
इस बबूल के वन से भी मकरंद पिघलकर आए
ऐसा फागुन आये अबकी काँटों की सूरत बदले
जे एन यू से कोई विवेकानंद निकलकर आये
और गाये रे
सोने की चिरैय्या
होगी फिर से धरती मैया
मेरे देश की।
कहीं पे रंग दे भगवद्गीता कहीं-कहीं गुरुवाणी,
कहीं पे रंग दे नटवर नागर कहीं पे राधा रानी,
कोई रंग बना दे मौला एक रंग जग रंग जाये,
रंग-रंग जैसा हो जाये पानी जैसा पानी।
मुस्कुराये रे फूल पे तितिलिया
गाये डाल पे कोयलिया।
मेरे देश की।
शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016
रंग दे चुनरिया मेरे देश की
चाँद घर आया है।
घनाक्षरी
हम हैं अनाड़ी और प्यार की कठिन राह,
दुनिया के दांव पेंच हम नहीं जानते।
दिन को कहो जो रात रात लगती है दिन,
रात को कहो जो दिन दिन हम मानते।
स्याही को सफेदी करो या सफेदी स्याही किन्तु,
हम तो तुम्हारा एक रंग पहचानते,
मेरे प्यार को भले कहो कि नाटक है,
किन्तु तेरा नाटक भी हम प्यार मानते
भोले भाले प्यार के पथिक हम गांव वाले,
जानते नहीं कि कौन अपना पराया है।
चलते रहे सदैव राह जो दिखाई तूने,
देखा ही नही कि कहाँ धूप कहाँ छाया है। जीवन फंसा हुआ है रूप जाल में तुम्हारे ,
रूप है कि रूपसी तुम्हारी कोई माया है। चाँद मेरे घर आये तो लगा कि तुम आई,
तुम घर आई तो लगा कि चाँद आया है।
चुनरी ध्वजा सी लहरा रही है अम्बर में,
नयनों में तीर व कटार लेके आयी हो,
भौंह है कमान व कमान पे चढ़ा है बाण,
अधरों पे लोहित अंगार लेके आई हो,
कामदेव की उपासना का परिणाम हो कि,
रति हो कि कोई अवतार लेके आई हो,
मेरे मन का अभेद्य दुर्ग जीतने का कोई,
शस्त्र हो या कोई शस्त्रागार लेके आई हो।
चंचल नयन से अचंचल हुआ है मन,
चंचला नयन से नयन भरमाओ ना।
मन है अधीर हुआ घायल शरीर मार,
नयनों के तीर इसे और तड़पाओ ना
आओ तो चली ही आओ जाओ तो चली ही जाओ,
जाकर न आओ या तो आकरके जाओ ना।
आग लेके आओ या तो पानी लेके आओ आग
पानी दोनों लेके आग पानी में लगाओ ना।
अपनी पे आ गया तो आँख ना मिला सकोगी,
आँख जो मिलेगी तो मिलाई नही जायेगी।
पुतरी फिरेगी नही पलक गिरेगी नही,
गिर भी गयी कहीं उठायी नही जायेगी।
आंख आंख से मिली तो आंख आंख न रहेगी,
आंख फिर आंख से हटाई नही जायेगी।
आँख से हुई जो बात बात ना रहेगी बात
बात ऐसी होगी कि बतायी नही जायेगी।
देखना ही चाहती हो भरके नयन देखो,
चोरी चोरी देखना भी कोई देखना हुआ।
फेंकनें का हो इरादा दिल से उतार फेंको,
चिट्ठियों को फेंकना भी कोई फेंकना हुआ।
ऊँगली में ऐसे न लपेटो ओढ़नी का छोर,
ऐसे ही लपेटना भी क्या लपेटना हुआ।
दूर दूर से निबाह बांह में फंसी न बांह,
ऐसी भेंट हो भी तो क्या कोई भेंटना हुआ
आपकी बाँहों में आना चाहता
**********× गीत ×**********
आपकी बाँहों में आना चाहता हूँ
द्वार सावन की झड़ी है,
यह मिलन की शुभ घडी है,
और एक दीवार अपने बीच बरसों से खड़ी है,
मैं इसे तत्क्षण गिराना चाहता हूँ
आपकी बाँहों में....................
जानता हूँ कंटकों के बीच है बगिया तुम्हारी।
फूल चुनने में उजड़ जायेगी यह दुनिया हमारी।
मौत मुंह बाए खड़ी है,
प्रीति पर उससे बड़ी है,
पत्थरों से खेलने वाले तुझे किसकी पड़ी है।
आ इधर मै चोट खाना चाहता हूँ,
आपकी--------------
पांव का कर लो महावर रंग हूँ धुंधला रहा हूँ
होंठ से छू लो मुझे मै फूल हूँ कुम्हला रहा हूँ
जिंदगी इतनी बड़ी है
प्यार जिसमे दो घड़ी है
देंह अपराधिनि हमारी बांह तेरी हथकड़ी है।
कैद कर ले मुक्ति पाना चाहता हूँ
आपकी बाँहों............
फूल चुन ले बाग़ से तू देख पतझर आ न जाए
रोक ले ओ राधिके मोहन तेरा मथुरा न जाए
दूर तू इतनी खड़ी है,
मन में व्याकुलता बढ़ी है,
मौन हैं कंगन तुम्हारे शांत बिछुए की लड़ी है।
दूर रहकर पास आना चाहता हूँ।
आपकी...........:-O..
प्रियांशु गजेन्द्र
बाराबंकी
9415587799
हिन्दुस्तान नही
🇮🇳🇮🇳 एक गीत उन राष्ट्रों को समर्पित जो चंद्रमां पर जाकर गर्व् कर रहे हैं 🇮🇳🇮🇳
देखा होगा चाँद मगर भारत सा ज्योतिर्मान नहीं
देखा भी तो क्या देखा यदि देखा हिन्दुस्तान नहीं
जहाँ गार्गी लोपामुद्रा सावित्री व सीता हैं
कंठ कंठ में रामायण हर दिल में बसती गीता है
जहाँ दिलों में गूँज रही अब्दुल अशफ़ाक़ की गाथाएं
तिलक लगाकर जहाँ भेजती रण में बेटे माताएं
कहीं पद्मिनी जौहर करती लक्ष्मी का बलिदान कहीं
देखा भी..............
जहाँ हिमालय चढ़ा तिरंगा गौरव पर इतराता है
शौर्य शांति सुख व समृद्धि का अनुपम गीत सुनाता है
ताजमहल सा भाव भरा संसार कहाँ मिल सकता है
मुनि दधीचि का जनहित में कंकाल कहाँ मिल सकता है
पत्थर मिल सकता दुनिया में पर उसमे भगवान् नहीं
देखा भी तो ..............
प्यार और भाई चारा से महक रही डाली डाली
विश्व विजेता भी भारत से आकर लौट गया खाली
फैलाता आतंक यहाँ जो कायर नीरा अभागा है
प्यार यहाँ पिस्तौल नहीं रेशम का कच्चा धागा है
नफरत की दुनिया में प्यारे पलते ना रसखान कहीं
देखा भी..........
पाकिस्तानी चीनी अफगानी जापानी आते हैं देख देख वन उपवन वापी मन ही मन ललचाते हैं
कश्मीरी शालें मलमल रेशम की साड़ी कहाँ रखी
रुनझुन रुनझुन करती ये बैलों की गाडी कहाँ रखी
सौ चक्कर मारो दुनिया के है ऐसा स्थान नहीं
देखा भी........
प्रियांशु गजेन्द्र बाराबंकी🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
चित्रण मेरे पास नही है
नयनों को लिखता मधु शाला
चितवन को मधु रस का प्याला
लेकिन जैसा रूप तुम्हारा दर्शन मेरे पास नहीं है।
जैसा चित्र तुम्हारा वैसा चित्रण मेरे पास नहीं है ।
तुमको गीत ग़ज़ल लिख देता
या तो नील कमल लिख देता ।
स्याही होती शाहजहाँ की
तुमको ताजमहल लिख देता ।
लेकिन कलम बांस के वन की
लिख ना सकी रीत मधुबन की।
कैसे गीत महकते मेरे चन्दन मेरे पास नहीं है ।
जैसा चित्र तुम्हारा वैसा चित्रण मेरे पास नहीं है।
देव सभा की तुम सुरबाला
स्वीकारो यह शाल दुशाला
मेरा पौरुष राम नहीं है
ला दे जो कंचन मृग छाला
जीवन की ये छप्परछानी
बुनते बुनते गयी जवानी
कैसे बुझती प्यास उमर की सावन मेरे पास नहीं है ।
जैसा चित्र तुम्हारा वैसा चित्रण मेरे पास नहीं है।
तप ही तप वरदान नहीं है
सच है ये अनुमान नहीं है
सम्मानित रहकर दुनिया में
जी लेना आसान नहीं है।
राते खड़ी खड़ी है प्यासी
नींदे किन्तु हुई वनवासी।
कैसे मांग भरू सपनो की आँगन मेरे पास नहीं है।
जैसा चित्र तुम्हारा वैसा चित्रण मेरे पास नहीं है ।
प्रियांशु गजेन्द्र
सवैये
रोज मिलौ जमुना तट पै तुम रोज करौ हमसे बरजोरी
काल्हि मरोरि दिह्यो बहियाँ तुम आज दिह्यो गगरी मोरि फोरी
आज निकारब सारी ढिठाई बचौ बचि पाऊ जौ खीस निपोरी
हौ तुम जौ बाबा नन्द के लालन तौ हमहूँ बृषभान किशोरी
2
गांव हमारे जौ आइहौ कबौ तब द्याखब या तुम्हरी ठकुराई।
नैन के खेल मा माहिर हौ तुम खेल मा द्याहौ ई प्राण गवाई।
एक से एक हैं बाँकी गुवालिनि नैन से नैन कै होइ लड़ाई।
नेह की फ़ांस मा फांसि तुम्है मरिहैं वही गांव म नाच नचाई।
3
सीस लटै लटकैं घुंघराली यों देखि जिन्है नगिनी सरमाती।
कंगन के नग के दमके खन सूरज की किरनै लुकि जाती।
हैं ब्रजबाला कयू ब्रज मा जो क़ि होंठ मा लाली कबौन लगाती।
लेकिन जानिकै कुन्दकली भंवरा केरी या छतिया फटि जाती।
4
है चुनरी लहर्यात ध्वजा असि नैन म तीर कटार धरे हैं।
भौह कमान चढ़ी चितवैं और होंठ पै लाल अंगार धरे हैं
हौ तुम काम कला के उपासक उइ रति कै अवतार धरे हैं।
राह न सूझि परी नटनागर उइ अतने हथियार धरे हैं
66
5
बालपने करिया दह मा कहूँ मारि दिह्यो तुम एक सप्वाला।
है परसिद्ध गोवर्धन कै रथ है तुम्हरी अंगुरी पर ड्वाला ।
वेद पुरान न भुलौ मूला जहाँ पर रूप से हारे दिगम्बर भ्वाला।
खाय न जायो कहूँ मनमोहन माखन जानि कपास का ग्वाला।
6
हाथ लगायो तौ तुम भरि पाइहौ हटौ हमरी पकरौ नहि सारी।
नाहि तौ पाइहौ अबै हमसे तुम एकइ सांस मा लाखन गारी।
गोरी है देंह हमारी तुम्हारी है कारी करो न पिया मोहे कारी।
चाँद हौ तू अपने घर के हमहूँ अपने घर की उजियारी
7
फूल मा कांटा बने हौ सदा एक रोज कबौ भंवरा बनि द्याखौ।
धूप न आई कबौ घर मा दूसरे के सिरे छपरा बनि द्याखौ।
होंठ पै प्यास रही न कबौ तुम प्यास तई गगरा बनिद्याखौ।
गोद मा खेलिहैं श्याम मूला तुम सूर तिना अंधरा बनि द्याखौ।
प्रियांशु गजेन्द्र।
नागफनियों की गली में
गहन गिरवर सघन वन में
बहकती पुरवा पवन में
दहकते धरती गगन में महकने दो प्यार मेरा
नागफनियों की गली में फूल का व्यापार मेरा
झोपड़ी या महल मैं कब देखता हूँ
हर खुली छत पर कबूतर भेजता हूँ
लोग लौटे हैं जहाँ से मुंह छुपाकर
मैं उन्ही गलियों में दर्पण बेंचता हूँ
चोट खाये लोग रहते जिस गली में
है वहीँ मरहम का कारोबार मेरा
नागफनियों की....................
खून के छींटे धरा से धो रहा हूँ
जो पुकारे मैं उसी का हो रहा हूँ
कल जहाँ बारूद की फसलें उगी थी
आज उन खेतों में मेंहदी बो रहा हूँ
दहकते अंगार बिखरे जिस गली में
है वहीँ चन्दन से निर्मित द्वार मेरा
नागफनियों की.....................
दिल में तेरे प्यार की दुनिया दफ़न है
भोर में ही दोपहर जैसी तपन है
मैं इधर शादी का जोड़ा बुन रहा हूँ
तू उन्ही धागों से क्यों बुनता कफ़न है
अर्थियों पर ही किया श्रृंगार तुमनें
डोलियों में चल रहा श्रृंगार मेरा
नागफ...........................
प्रियांशु गजेन्द्र
बाराबंकी उ0प्र0
मंगलवार, 23 अगस्त 2016
सिसकियाँ कह गयी
होंठ खामोश थे सिसकियाँ कह गयी
द्वार तो बंद थे खिड़कियां कह गयी
कुछ नयन ने कहा नींद ने कुछ कहा
जो बचा था उसे हिचकियाँ कह गयी
(2)
कंगनों ने कहा चूड़ियाँ कह गयी
कुछ अंगूठी तो कुछ उँगलियाँ कह गयी
एक मीरा की दीवानगी की कथा
मंदिरों में बंधी घंटियां कह गयी
(3)
मैंनें हंसकरके तुम रूठकर कह गयी
मैं बंधा और तुम छूटकर कह गयी
राधिका ने कहा था जो घनश्याम से
उसको मीरा जहर घूँटकर कह गयी
(4)
चाँद चलकर धरा घूमकर कह गयी
बावरी निर्झरा झूमकर कह गयी
जो कि ब्रम्हा नहीं कह सके वेद में
वह अहिल्या चरण चूमकर कह गयी