सोमवार, 25 फ़रवरी 2019

क्या कभी सोंचा भँवर का क्या हुआ


डूबकर तुम तो किनारा पा गये ,
क्या कभी सोंचा भँवर का क्या हुआ?
जो तुम्हारे साथ थी लौटी नहीं,
क्या कभी सोंचा लहर का क्या हुआ?

जो लिए था कल तुम्हें आग़ोश में,
आज उसकी बाँह में कोई नही,
कश्तियाँ उससे किनारा कर गयी,
और लहरें रात भर सोयी नहीं।

जो अधूरी छोड़ दी तुमने ग़ज़ल,
क्या कभी सोंचा बहर का क्या हुआ?

तुम कमल की पांखुरी सी जी रही,
जल में रहकर जल से जो निर्लिप्त है।
जल में रहकर मैं जो जल में मिल गया,
मुझको दुनिया कह रही विक्षिप्त है।

रेत पर हमने बसाया था जिसे
क्या कभी सोंचा शहर का क्या हुआ।

पत्थरों के भाग्य में ही है लिखा
उम्र भर ठोकर लगानी है उन्हें,
किन्तु पाँवों से भला किसने कहा?
साथ ही उनके निभानी है उन्हें ।

ठोकरें खाए बिना ही जो चला
क्या कभी सोंचा सफ़र का क्या हुआ?

Priyanshu प्रियाँशु गजेन्द्र

शनिवार, 23 फ़रवरी 2019

तुम्हारी याद साथी है

तुम नही हो तो तुम्हारी याद साथी है
याद ऐसी जो तुम्हारे बाद साथी है।

मै अकेला कब रहा तुम थे हमारे साथ मन में
सामने जब थे तो थे नहीं थे तो थे जज्बात मन में,
प्यार के आगे भला क्या टिक सकेंगी दूरियां भी
कुछ नही रहता तो रहती है तुम्हारी बात मन में।
मरहमों से क्या गिला आघात साथी है,
तुम नहीं हो तो तुम्हारी......................।

विरह में जलकर भी हमने बस तुम्हार ताप देखा,
बस तुम्हें देखा किसी को देखने में पाप देखा
प्यार में मर मर के जीना कोई क्या दिखलायेगा
जो भी देखा प्यार करके मैने अपने आप देखा।
स्वर नहीं तो मौन का संवाद साथी है।
तुम नहीं हो तो तुम्हारी......................।

तन भले है दूर कितना मन मे अब भी चित्र तेरा,
आज इन टेंसू के फूलों ने जिसे फिर फिर उकेरा
ओ हवा रुक जा तनिक उपहार दे देना उसे कुछ
स्वांस की खूशबू से खुश हो जाएगा वह मित्र मेरा
और कहना उम्र भर अवसाद साथी है ।
तुम नही हो तो तुम्हारी याद.......।

सोमवार, 31 दिसंबर 2018

नया साल फिर याद पुरानी

नया साल फिर याद पुरानी
प्यार कहो या फिर नादानी
मैंने फिर एक साल पुराना चित्र हृदय में बना लिया है।
बिना तुम्हारे नया साल फिर किसी तरह से मना लिया है।

डगमग दृष्टि तुम्हारी लेकरके आँगन में चौक पुराए,
अधरों से कुछ लाली लेकर उन पर थोड़े रंग चढ़ाए,
गोरा रंग वदन से लेकर थोड़ी धूप खिलायी मैंने ,
धूप तुम्हारी पाकर गमले वाले फ़ूल बहुत मुस्काए,

मन से सबकुछ किया मगर मन ही मन सब अनमना किया है।
बिना तुम्हारे ..........................................।

तुम बोलो अपने बारे में कैसा साल तुम्हारा बीता
इस दौलत के खुले युद्ध में तुमने क्या हारा क्या जीता,
जीवन के रंगीन सफ़र में मिला कौन किसका संग छूटा
भरा तुम्हारा दौलत का घट या फिर अभी रह गया रीता,

किसको कितना सुना और किसको कितना अनसुना किया है
बिना तुम्हारे ..........………........................।

ईश्वर करे तुम्हारे यश वैभव में चार चाँद लग जाएँ
स्तुति करें देवता द्वारे देवपुत्रियाँ मंगल गाएँ ,
जो कुछ अब तक नही मिला है ईश्वर दे दे नए वर्ष में,
आप हर्ष से वर्ष वर्ष भर जीवन में नव वर्ष मनाएँ ।

फल तुमको मिल जाएँ मैंने अब तक आराधना किया है
बिना तुम्हारे .................................................।

मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

एक फूल गिरा फिर अटल जी को समर्पित

स्वर्गीय अटल जी को समर्पित पढ़ें और शेयर करें

एक फूल गिरा फिर डाली से,
सारा उपवन हो गया मौन,
भँवरे तितली फिर हैं उदास,
गीतों की कड़ियाँ टूट गयी,
स्वर में है सुनी दीर्घ स्वांस,
सहमी सहमी हर कली आज,
कुछ डरी डरी है माली से।
एक फूल............
पत्तों के नम हो गए नयन,
शूलों को भी रोना आया,
उत्सवमय सारा स्वर्गलोक ,
एक दुलहन का गौना आया,
कैसी है रीति विधाता की,
कैसा है ईश्वर का विधान,
सारी धरती जो नाप गया,
उसके हिस्से कोना आया,
जाने फिर कौन कहाँ छूटे,
डर लगता अब रखवाली से,
एक फूल.......................।
हम दिन दिन रचते जाते हैं,
अपने सपनों के शीश महल,
बच्चे बन खेल खिलौने से,
कुछ पल की खातिर गये बहल,।
कुछ पल तक सारा खेल रहा,
कुछ पल हम राजा रानी थे,
कुछ पल में सब कुछ नष्ट हुआ,
कुछ पल में सब कुछ गया बदल,
कुछ पल का नाता जीवन का
था स्वांसों की मतवाली से,
एक फूल.....................।
तुम अटल तपस्वी जीवन के,
तुमसे मेरा सम्मान बढ़ा,
तुमसे रजनी हो गयी अस्त,
फिर पूरब में दिनमान चढ़ा,
वीरता पराक्रम पौरुष के,
हे तेजपुन्ज हे महापुरुष,
तेरी छाया में भारत ने,
था कारगिल में जयगान पढ़ा।
तुम इक इतिहास रचयिता थे
जग में शोणित की लाली से
एक फूल .........................।
प्रियांशु गजेन्द्र

ग़ज़ल

तुम क्या जानो मन पर इतना बोझा कैसे ढो लेते हैं
जब एकांत समय मिलता है चुपके चुपके रो लेते हैं,

मेरी आँख बहुत छोटी थी तुमने सपने बड़े दिखाए ,
अब आँखों में राजमहल ले फुटपाथों पर सो लेते हैं।

पागल है पपिहा वर्षों से स्वाति बूँद पर भटक रहा,
चतुर वही हैं हाथ जो हर बहती गंगा में धो लेते हैं

हम किसान के बेटे साहब दुःख सह लेने की आदत है,
हम भूखे रहकर भी जग की ख़ातिर फ़सलें बो लेते हैं

मोम कह रहा था वह ख़ुद को पत्थर था पत्थर निकला,
समझ न आया पत्थर कैसे मोम सरीखे हो लेते हैं।

{2}
वफ़ा करी है करी तो ऐसी तुम्हारे बिन भी रहे तुम्हारे,
लड़े बहुत अपने आप से हम मगर जो हारे तुम्हीं से हारे।

नशा नयन का नहीं है मुझको अभी मैं लौटा हूँ मयकदे से,
मुझे कोई अब गली में उनके दीवाना कहकरके न पुकारे।

जो दिल में होते उतार देते कोई भले कुछ भी कहता लेकिन,
मेरा ही दिल जब बसा है उनमें भला मेरा दिल किसे उतारे

जनक ने देखा श्री राम जी को प्रभू ने देखा विशाल धनुहा,
विषम परिस्थिति है जानकी की सजल नयन से किधर निहारे,

तुम्हें तमन्ना थी राम बनकर कभी मैं आऊँ तुम्हारे दिल में,
न बेर तुमने रखे हैं घर पर न फ़ूल फेंके न पथ बुहारे।

भँवर में ले चल रे नाव माँझी तमाशा देखूँ ज़रा लहर का,
किनारे ही चाहते हैं मुझसे मैं फिर न लौटूँ कभी किनारे।

{3}

बिना बताए जहाँ गये तुम वहाँ भी अपना ख़याल रखना,
तुम्हारे बिन अब मैं कुछ नही हूँ मेरा न कोई मलाल रखना।

अभी समय ने मुझे मिटाया समय ही तुमसे हिसाब लेगा,
हमारी चाहत के आँकड़ों को कहीं ज़हन में सम्हाल रखना।

जो फूल से भी कभी थे नाजुक कलेजा पत्थर हुआ तो कैसे?
खुदा  मिले तो मैं चाहता हूं उसी के आगे सवाल रखना।

मिलेंगे पत्थर कई तरह के तुम्हारे कदमों को छील देंगे,
डगर मोहब्बत की अब नई है नए चलन की उछाल रखना।

ग़ज़ल

हम बिखरकर भी सम्हालेंगे तुम्हें विश्वास रखिए,
किंतु सारी उम्र मुझसे दूर अपनी प्यास रखिए ।
भीख माँगूँगा न किरणो की भले घर फूँक लूँगा,
चाँद तेरा चाँद है तो चाँद अपने पास रखिए ।
क्या कहा तुमको किसी से प्यार होता जा रहा
एहतियातन कह रहा हूँ जेब में सल्फास रखिए ।
कौन कितना प्यार तुमसे कर रहा है जानना हो
एक दिन कुछ देर यूँ ही बंद अपनी स्वाँस रखिए ।
याद तुम आती हो तो आ करके जाती ही नही हो,
कमसे कम सप्ताह भर में एक दिनअवकाश रखिए।

ग़ज़ल

तुम पर आँच न आए दुःख की अपने सारे ग़म पीते हैं
गर्मी  भर व्हिस्की पीते हैं फिर जाड़े भर रम पीते हैं।
जब से तुमसे नैन मिले हैं तबसे हालत सुधर गयी कुछ,
कभी कभी पीते हैं लेकिन अब पहले से कम पीते हैं।
तरह तरह से नाम बदलकर पीते रहते पीने वाले,
हम गंगा जल मान रहे हैं वे आबे जमजम पीते हैं।
दिल के हर कोने में मैंने इतने चित्र बनाए उनके,
याद बहुत जब आने लगती आँखों से अल्बम पीते हैं।
जो सागर पीकर बैठे हैं वे हैं इज़्ज़तदार शहर के,
चोर उचक्के वे कहलाते जो थोड़ी शबनम पीते हैं,
उनको सौंप दिया मयखाना जिनको इल्म नही पीने का,
प्याले धन्य हुआ करते हैं जिन प्यालों में हम पीते हैं।