बुधवार, 27 जून 2018

कहो युधिष्ठिर

शरशैय्या पर लगे पूंछने भीष्म पितामह
कहो युधिष्ठिर इंद्रप्रस्थ कैसा लगता है।
कहो युधिष्ठिर।

पतझर सा सूना सूना लगता है उपवन,
या फिर गीत सुनाती हैं अलमस्त हवाएं,
छमछम नूपुर बजते रहते राजभवन में
या फिर करती हैं विलाप व्याकुल विधवाएं।
कहो युधिष्ठिर कौरव कुल के लाल रक्त से,
धुला हुआ यह राजवस्त्र कैसा लगता है?
कहो युधिष्ठिर।

धर्म युद्ध है धर्मराज यह कहकर तुमने,
कौरव के समान ही की है भागीदारी,
धर्मयुद्ध था या अधर्म यह ईश्वर जाने,
पर समानतम थी दोनों की हिस्सेदारी।
कहो युधिष्ठिर धर्म युद्ध या केवल हठ में,
मानवता हो गयी ध्वस्त कैसा लगता है?
कहो युधिष्ठिर।

गली गली में लाखों प्रश्न खड़े हैं लेकिन,
प्रश्न सभी यदि युद्धों से ही हल हो जाते,
तो राधा के नयन प्रलय के आंसू लाते,
और सुदामा के तंदुल असफल हो जाते,
कहो युधिष्ठिर यह कैसा है धर्म जगत का ,
जीवन ही हो रहा नष्ट कैसा लगता है ।
कहो युधिष्ठिर

धर्मराज धर्मावतार सत्पथ अनुगामी,
तुमसे बढ़कर कौन जानता मर्म हमारा,
धर्म अगर संकट बन जाए राष्ट्रधर्म पर,
तो अधर्म के साथ रहूं था धर्म हमारा।
कहो युधिष्ठिर क्या था मेरा धर्म कि जिससे
जीवन था सब अस्त व्यस्त कैसा लगता है?
कहो युधिष्ठिर

क्या अब कर्ण नहीं बहते हैं  गंगाजल में,
क्या निश्चिन्त हो गयी जग में कुन्ती मायें,
सर्वनाश हो गए कहो कुल दुशाशनों के,
या लुटती रहती हैं अब भी द्रुपद सुताएँ।
कहो युधिष्ठिर भोर हो गयी क्या भारत में,
या सूरज हो रहा अस्त कैसा लगता है?
कहो यधिष्ठिर?

प्रियान्शु गजेन्द्र

किसको मन का गीत सुनाऊँ

तुमने खुद को मौन रख लिया
मैंने ढाल लिया गीतों में,
कहो प्रिये युग युग की संचित
मन की पीर कहाँ बरसाउँ,
किसको मन का गीत सुनाऊँ

आग लगी है चन्दन वन में,भीतर भीतर राख हो रहा,
पँछी छोड़ गए हैं जिसको जीवन सूनी शाख हो रहा,
मधुऋतु हुई तुम्हारी साथी
पतझर मेरे साथ चल पड़ा
कहो प्रिये चुभते शूलों को
कैसे कोमल फूल बनाऊं।

दिन यादों का बोझ सम्हाले रात रात भर सपना ढोएं,
तन को दो ही नयन मिले हैं रोएं भी तो कितना रोएं।
तुमने भगवद्गीता पढ़ ली,
कुरुक्षेत्र में भ्रमित खड़ा मै,
कहो प्रिये सम्मुख सब अपने,
किस पर अपना तीर चलाऊं।

अन्धकार फिर जीत न जाये,तम से अमर उजाला हारे,
थक न जाय यौवन का साकी,अक्षय प्रेम का प्याला हारे,
जनम जनम के अमिट प्यार की,
अब तक लाज बचायी लेकिन,
कहो प्रिये किस किस दर्पण से,
इस चेहरे का रंग छुपाऊं।
किसको मन का गीत सुनाऊँ।
प्रियान्शु गजेन्द्र





गुरुवार, 22 मार्च 2018

तुम भी थोड़ा रोये क्या

हमने तो बादल बरसाए
तुम भी थोड़ा रोये क्या?
कुछ सुलझे कुछ अनसुलझे हैं
प्रश्न कई लेकर लौटा हूँ,
तुमको पाने की चाहत में
मै खुद को देकर लौटा हूँ,
हमने धोया चेहरा अपना
अधर भी तुमने धोए क्या?

मुझमे तुम हो इससे तुमको
मेरी सूरत प्यारी लगती
अपनी रंगत अंधे को भी
सारे जग से न्यारी लगती,
हम सब कुछ खोकर लौटे हैं,
क्या तुम भी कुछ खोए क्या?

सांसें क्या हैं चन्द हवाओं के
टुकड़ों का आना जाना,
तुम खुद ही भगवद्गीता हो
तुमको दर्शन क्या समझाना,
हम सुलझे थे उलझ गए हैं,
तुम उलझन सुलझाए क्या?
प्रियान्शु गजेन्द्र

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

न वह मुझसे बोली

सुबह शाम हर दोपहर नाचती थी,
घड़ी दो घड़ी भर ठहर नाचती थी,
लहरकर लहरकर लहर नाचती थी
न वह नाच हारी न मै देख हारा,
न वह मुझसे बोली न मैंने पुकारा।

कोई थम गया है कोई अब चला है
कहीं रौशनी है कहीं जलजला है
नदी हँस रही हँस रहा है समन्दर,
उसे क्या पता एक हिमालय गला है।
जलाते जलाते जली जा रही थी,
नियति के करों से छली जा रही थी
प्रणय गीत गाती चली जा रही थी।
न वह चलके हारी न मै थमके हारा
न वह मुझसे..........

कई फूल टूटे खिले भी नही थे
कई तो भ्रमर से मिले भी नही थे
नहीं बोल पाये ये दीवानगी थी,
वरन होंठ मेरे सिले भी नहीं थे
ह्रदय में अधर की तपन जल रही है
पुरानी प्रथा है प्रथा चल रही है
मगर प्यार की हर कसम पल रही है
न वह श्वांस हारी न मै प्राण हारा।
न वह मुझसे बोली..................।

अभी कुछ कदम ही गयी होगी आगे,
उसे रोक भी ना सके तुम अभागे,
कोई भोर आये कोई सूर्य आये,
किरण क्या करे भाग ही यदि न जागे,
हृदय ने कहे जो हृदय ने सुनाये,
समय के अधर ने वही गीत गाये,
रहे उसके दिल में भी रहकर पराये,
न वह मन से उतरी न मैंने उतारा।
न वह मुझसे..........................!

प्रियांशु गजेन्द्र

गुरुवार, 2 नवंबर 2017

मुक्तक (चिट्ठी)

सुबह लिख लिखके लायेगी सुहानी शाम की चिट्ठी,
किसी मीरा के मोहन की सिया के राम की चिट्ठी,
किसी ना तो किसी दिन डाकिया देगा मुझे आकर,
तुम्हारे हाथ से लिक्खी हमारे नाम की चिट्ठी।

नयन को पढ़ने दो अपने अधर के जाम की चिट्ठी,
वदन का रंग है या रंग लाई  काम की चिट्ठी,
भले सोने के अक्षर से लिख़ी है रूप की गीता,
न पढ़ पाया कोई अर्जुन तो फिर किस काम की चिट्ठी,

न पढ़ना तुम कभी जग के महासंग्राम की चिट्ठी,
पढ़ो यदि पढ़ सको युद्धों के दुष्परिणाम की चिट्ठी
थी जिन हाथों में तलवारें मिले वे हाथ मिट्टी में,
सिकन्दर की पढ़ो चाहे पढ़ो सद्दाम की चिट्ठी।

पढ़ो तो बस पढ़ो तुम प्यार के परिणाम की चिट्ठी
न गीता बाइबिल कुरआन ना गुरुग्राम  की चिट्ठी,
जो दुनिया पढ़ ही पाती मंदिरों मस्जिद की भाषा तो,
लहू से क्यों लिखी जाती अयोध्या धाम की चिट्ठी।

शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017

एक मुट्ठी में नफरत एक में प्यार

एक मुट्ठी में नफरत एक में प्यार
जाने किस दुनिया से लाये,
यूँ समझो दो दीप जलाए,
एक से जगमग सारी धरती एक से जग अंधियार।

एक ओर पूरा मयखाना एक ओर दी प्यास,
तुमको काम कलाएं देकर मुझे दिया सन्यास,
तुम जबसे हो गए पराये,
हमने भी दो गीत बनाये,
एक अधर से मरुथल गाया एक से मलय बयार
एक मुट्ठी........................।

केसर के पौधों में आये हैं पत्थर के फूल,
माली ने बरगद रोपा था लेकिन उगे बबूल।
कली कली का खून बहाये ,
यूँ समझो डोली लुटवाये,
एक साथ मिलकर आये हैं डाकू और कहाँर।
एक मुट्ठी..............…...

तुम्हे अधर की हंसी मिली है मुझे नयन में नीर,
इस दिल्ली में राजघाट के पीछे है कश्मीर ,
भाग्य लेख ना मिटे मिटाए
दुःख है वे खत गये जलाए।
जिनमें  जुम्मन की चौखट पर अलगू का दरबार।
एक मुट्ठी में...…...............।

मंगलवार, 16 मई 2017

तुम्हारे गीत गाऊंगा

तुम्हारे गीत गाऊंगा।
प्यार के हर एक चलन तक,
आंकड़ों से आकलन तक,
आज से अपने मिलन तक पथ सजाऊंगा,
तुम्हारे........
भीड़ में नज़रें चुराना,
धीरे धीरे गीत गाना,
और फिर कुछ दूर जाकर,
पीछे मुड़कर मुस्कुराना,
प्यार के जितने भी ढंग हैं, सब निभाउंगा।
तुम्हारे.......
देंह को पर्वत लिखूंगा,
मन को तप में रत लिखूंगा,
फिर भी यदि लआये नहीं तो,
आंसुओं से खत लिखूंगा।
नाम लिखकर नाव कागज की बहाऊंगा।
तुम्हारे.............
रात के पिछले पहर तक,
भोर से फिर दोपहर तक,
कब रहे हम दूर तुमसे,
आदि से अंतिम सफर तक,
साथ आया साथ रहकर साथ जाऊंगा।
तुम्हारे गीत गाऊंगा।

प्रियांशु गजेन्द्र