रविवार, 30 जनवरी 2022

मेरे उपवन को छोड़

मेरे उपवन को छोड़ चली जाओ कलियों,
मैंने अब  मदगंधों से नाता तोड़ लिया।
हर मौसम में चाह जिन्हें हरियाली की उन 
सावन के अन्धों से नाता तोड़ लिया।

काँटों से अब ब्याह लिया है जीवन को,
मुस्काती हंसती ये कलियाँ क्या करना,
चलने को जब ठान लिया ही है मन में,
पत्थर हो या मख़मल गलियाँ क्या करना।

जो मंज़िल तक साथ नही दे सकते मेरा,
मैंने उन कन्धों से नाता तोड़ लिया।

कलियाँ नही उगाने का अब मन मेरा तो,
बादल बरसे या बरसे बिन रह जाए,
श्याम नही अब लौटेंगे वृंदावन में फिर,
राधा का काजल ठहरे या बह जाए।

यमुना की लहरें सिमटें या लहराएँ,
मैंने तटबंधों से नाता तोड़ लिया।

थोड़ी सी सुगन्ध की ख़ातिर यौवन का,
रक्त नही दे पाउँगा मैं क्यारी को,
अब चाहे तो सारा पतझर आ जाए,
आग लगे इस फागुन की तैयारी को,

जो इस दिल का गीत नही गा सकते स्वर में,
मैंने उन छ्न्दों से नाता तोड़ लिया।

Priyanshu Gajendra

सोमवार, 20 सितंबर 2021

एक दिन तो

एक दिन तो अलग हमको होना ही है,
कल जो होना है वह आज ही से सही,
दुःख रहेगा तो बस एक ही बात का,
बात सारी रही अनसुनी अनकही।

इस चमन में कहाँ फ़ूल इतने खिले,
हर भ्रमर की जहां पूर्ण हो साधना।
हर नयन में लिखी प्राप्ति की लालसा,
हर अधर पर लिखी प्यास की याचना।

इस तरह से रहा प्यार तेरा भ्रमर,
जब रहा तब रहा अब नही तो नही।

तुम भी फूलो फलो हम भी फूलें फ़लें
ज़िन्दगी उस विधाता का उपहार है,
वह किसी को भला दे सकेगा तो क्या
अपने ऊपर नही जिसका अधिकार है,

प्यार के पन्थ में क्या  सही क्या ग़लत,
जो ग़लत वह ग़लत जो सही वह सही।

हम मुसाफ़िर हैं इस रात की भोर तक,
एक सूरज सुबह हमको ले जाएगा,
वाष्प की बूँद ने  ने यूँ कहा फ़ूल से,
इक नयी बूँद फिर चाँद दे जाएगा,

इस तरह से चली बूँद की ज़िन्दगी,
जब जमी तब जमी जब बही तब बही।

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

कृष्ण वियोग

१ 
श्याम गए तो गए मथुरा मथुरा न गयी वृषभानु दुलारी,
कौन सी आन रही मन में वह आन गयी मन से न उतारी,
जाकर हाल न पूँछ सकी किस हाल में है ब्रजधाम बिहारी,
प्यार के बन्धन बांध हमें किस बांध में जाके बँधे बनवारी।
पन्द्रह ही दिन बोल गए इक मास हुए पर लौट ना आए,
भेजती कोई कबूतर जो कि सन्देश यहाँ से वहाँ पहुँचाए,
कौन कमी रही प्यार में जो यदुनंदन प्यार की रीति भुलाए
जो सबको भरमा गये हैं उनको भला कौन वहाँ भरमाए।
कोई नही दिन बीतता है मनमोहन को जब याद ना आए,
काग मयूर बया बगुले बस देखते हैं किस ओर से आए,
आए जो हैं ब्रजभूमि से तो अभी राधिका की छवि देखके आए,
देख उन्हें मन नाच उठे मानो राधिका को ख़ुद देखके आए।

फूल खिले भँवरे लिपटे मकरंद भरी बगिया महकाये,
सावन के दिन भाद्र की रात आषाढ़ की दोपहरी जब आये,
धीर धरो कितना भी भले मन पे पर धीर धरा नहि जाए,
कोई कहीं से नही कहता चलो राधिका है वहाँ नैन बिछाये।
गोकुल के बछड़े बछड़ी बस व्याकुल हैं मथुरा नहि आये,
वृक्ष कदम्ब के वैसे खड़े न झुके न गिरे न खिले मुरझाये,
मौन खड़े गिरिराज वहीं यमुना उसी ओर ही नीर बहाये
भूल गए ब्रज वासी ही या ब्रजवासियों को घनश्याम भुलाये।
राधिका का उन्माद चढ़ा अब और कोई उन्माद नहीं है
राधिका हो न हो राधिका के प्रति मानस में दुर्वाद नही है
राधिका से पहले नहि था कुछ राधिका के कुछ बाद नहीं है ,
याद में राधिका है इतना बिन राधिका के कुछ याद नहीं है,
श्याम बिना नहीं राधिका तो बिन राधिका स्याम नहीं रह पाते,
श्याम में राधा नही रहती यदि श्याम वियोग नहीं सह पाते,
वृक्ष नदी तट पे रहते जलधार के साथ नहीं बह पाते।
भीतर भीतर पीर भरे पर पीर किसी से नहीं कह पाते।
आदि व अन्त अनंत में राधिका मध्य में राधिका की छवि छायी,
अर्ध्य व ऊर्ध्य प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष दिशा विदिशा में वही है समायी,
जीत में हार में लाभ में हानि में राधिका राधिका ही दे  दिखायी,
नैन ही राधिका में जा बसे या कि राधिका ही हर ओर से आयी।
फूल कदम्ब के फूल उठे या कि राधिका फूल के फूल हुई है,
है ऋतुराज अनंग प्रसन्न की ये ऋतु ही अनुकूल हुई है।
पाँव रखे जिस ओर जहां उस ओर की चंदन धूल हुई है,
भूल गयी मुझे राधिका या मुझसे ही कोई बड़ी भूल हुई है।

ग़ज़ल

कहानी 
कहानी कुछ बनायी जा रही थी,
कहानी कुछ सुनायी जा रही थी,

खड़ा था दिल के दरवाज़े पे मै पर,
मुझे खिड़की दिखायी जा रही थी।

मै लिखना चाहता था छंद लेकिन,
मुझे ग़ज़लें लिखाई जा रही थी।

जिसे पीना था नयनों का अमिय रस,
उसे मदिरा पिलायी जा रही थी।

बुझाने आग निकला जब शहर की,
मेरी बस्ती जलायी जा जा रही थी।

जहाँ मैं ज़िन्दगी लेने गया था,
वहाँ अर्थी उठायी जा रही थी।

शुक्रवार, 27 अगस्त 2021

अपनेपन से कहो

अपनेपन से कहो 
जो है कहना तुम्हें,अपनेपन से कहो 
मै चला जाऊँगा ज़िंदगी से तुम्हारी तुम्हारी क़सम 
अपनेपन से कहो,

पृष्ठ होकर भी हम हाशिए पर रहे,
तुमने पढ़ने से पहले किनारा किया,
तुममें जो था तुम्हारा तुम्हारा रहा,
मुझमे जो था हमारा तुम्हारा किया,
अपने पन से कहो 
याद सारी जला दूँ अभी से तुम्हारी तुम्हारी क़सम,
अपने पन से कहो।

लौट बादल गए फिर से बरसे बिना,
हम थे सावन का उत्सव मानते रहे।
नींद आयी जो नयनों के अधिकार में,
रात भर स्वप्न के शव उठाते रहे ।
अपने पन से कहो 
मोड़ जाऊँगा मुँह आशिक़ी से तुम्हारी,तुम्हारी क़सम।
अपने पन से कहो।

चोट पर चोट लगते हुए एक दिन,
दर्द में डूबकर दर्द मर जाएगा।
चोट दे करके तब हार जाओगे तुम,
वक़्त जब भी मेरा घाव भर जाएगा।

अपने पन से कहो।
जीत जाऊँगा मै दिल्लगी से तुम्हारी तुम्हारी क़सम 
अपनेपन से कहो।

प्रियांशु गजेन्द्र 27 अगस्त 20121

मंगलवार, 22 जून 2021

ओ संविधान के निर्माता

ओ संविधान के निर्माता 
दीनो दुखियों के सुखदाता
दीवानो की बस्ती का दुःख सच सच कहना क्या  दिखा नही ?
या दिखा मगर अनदिखा रहा या दिखा देखकर लिखा नही।
सब न्याय लिखे अन्याय लिखे,
जाने कितने अध्याय लिखे,
समरसता हो हर मानव में,
इसके हित कई उपाय लिखे 

फिर दिल को तोड़ कोई सोए,
कोई उठ उठ रात रात रोए,
असमान दर्द की दुनिया का यह अनुच्छेद क्यों रखा नहीं,
या दिखा मगर …….

सबको समानतम प्यार मिले,
छह छह मौलिक अधिकार मिले,
इक्किसवाँ अनुच्छेद कहता 
सबको जीवन उपहार मिले,

कोई रोता है कोई हँसता है,
कोई जीता है कोई मरता है,
अन्यायी प्रेम कचहरी में जलती क्यों न्यायिक शिखा नही 
या दिखा …..

हो लाल क़िले से उद्बोधन,
पांडव बोलें या दुर्योधन,
हम प्रेम नगर के बाशिंदे,
बस चाह रहे यह संशोधन।

यह भारत भू सृंगार करे,
मानव मानव से प्यार करे,
क्या लिखा अगर नफ़रत वालों ने पाठ प्रेम का सिखा नहीं,
या दिखा ………
Priyanshu Gajendra

गुरुवार, 17 जून 2021

राम अखिलेश्वर

(१)
राम नाम पे सदैव राजनीति ही हुई है त्रेता युग में जो मंथरा ने शुरुआत की ,
रूप बदला तो आए द्वापर में श्याम बन कंस ने वहाँ भी जन्म पूर्व ख़ुराफ़ात की,
मुग़ल पधारे जन्म भूमि पे किए चढ़ाई नीयत बुरी थी किंतु आके मुलाक़ात की,
बात बात में अभी भी राम की है बात किंतु राम जी से ना कभी किसी ने कोई बात की ।
(२)
राम अखिलेश्वर अलौकिक अनादि अन्त रोम रोम राम में रमायी माता जानकी,
जगत पिता हैं रघुनन्दन दुलारे राम जगत जननि मेरी माता जानकी,
यज्ञ के पुनीत हव्य से प्रकट राम जी तो खेत की जुताई की कमाई माता जानकी,
सरयू के नीर में समाए श्रीराम जी तो धरती की कोख में समायी माता जानकी।
(३)
विश्वामित्र जी के तप में तपाए गए राम अग्नि के ताप में तपाई माता जानकी,
सामने रहे तो वे खिली खिली रही सदैव ओझल हुए तो मुरझाई माता जानकी,
दंडक वनों में राक्षसों के बीच सोए राम कंटकों के बीच जाके सोई माता जानकी,
चौदह वर्षों पे लौट आए वनवासी राम वन जो गई तो नहीं आयी माता जानकी।
(४)
आडवाणी जी के रथ पर घुमाए गए राम साथ साथ गई न घुमाई माता जानकी,
सच जो कहूं तो तुझे भाए हैं हमेशा राम फूटी आंख कभी न सुहाई माता जानकी,
त्रेता युग में पराया राम ने किया तो आज कलयुग में भी हैं पराई माता जानकी,
बोल री अयोध्या तुझसे करें गुहार या कि योगी मोदी जी की दें दुहाई माता जानकी।
(५)
राम जी को अपना रही है आज की अयोध्या बोल क्यों न गई अपनाई माता जानकी,
बहू और बेटा एक ही समान होता यदि क्यों नहीं सामान पद पाई माता जानकी,
राम जी की जन्मभूमि जन्मभूमि के हैं राम जनकपुरी से यहां आई माता जानकी,
बहू बहू होती बेटा बेटा जैसा होता हाय बेटा होती होती क्या पराई माता जानकी।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

सवैये {होली}

सवैये 

रंग से रंग मिले इतने ख़ुद रंग में डूब नहा गयी होली,
प्रेम पुरातन जाग पड़ा फिर प्रेम की प्यास जगा गयी होली,
साजन हैं जिनके घर में उनके हर शोक भगा गयी होली,
दूर बसे जिनके उनके बस देंह में आग लगा गयी होली।

2
रंग लगा गयी गाल पे जो हम चाह के भी तो छुड़ा नहि पाए 
फ़ूल की गंध में लीन रहे बस फ़ूल की गंध चुरा नहि पाए 
हाथ हिला गए आप चले हम चाह के हाथ हिला नहिं पाए 
नैन से दूर गए तुम तो किसी और से नैन मिला नहि पाए 
3
पत्र पठाए कई सब लौट के आए तुम्हारा पता नही पाए 
पाँव चले कई मील चले पर ठीक कोई रस्ता नहि पाए 
सूरज ही ना मिला ढलता हुआ चाँद  नहीं उगता हुआ पाए 
प्यार किया तुमसे तुमसे पर बात यही कि बता नहि पाए।
4
आए तो आप बुलाए नही जो बुलाए भी तो हम आ नहि पाए 
जा तो रहे थे कि जाएँ चले जब जाने लगे तब जा नहि पाए 
एक तुम्हीं न मिली मुझको हम और भला अब क्या नहिं पाए 
प्यार मिला दुनिया का हमें हम ही अपनी दुनिया नहि पाए 
(५)
बात यही इतनी जितना समझे उतना समझा नहि पाए,


राह न यूँ बदलो अपनी हम यूँ नही  तेरी राह में आए,
बाँह न जाने खुली कितनी पर एक तुम्हारी ही बाँह में आए,
थाहते थाहते सिन्धु कई अब नैन के सिन्धु अथाह में आए।
नैन हटे लगा आम की छाँह को छोड़ बबूल की छाँह में आए।


बालपना गुज़रा है अभाव में साहब सेठ नही बन पाए 
और जवान हुए तब रूप शिकारियों ने खूब जाल बिछाये 
चोर मिले चितचोर मिले पर चोरी में जा न सके हैं चुराए 
हाथ तुम्हारे लगे हम वो जो कभी भी किसी के भी हाथ न आये ।

मैं न कभी मिल पाता  तुम्हें मिलवाए गये हैं तभी मिल पाए ।
सत्य यही है कि ईश्वर चाह रहा था तुम्हें मुझसे चहवाये।
चाह ले दो दिल दूर करे वह चाह ले दो बिछड़ों को मिलाए।
चाह उसी की गजेन्द्र जहाँ पर शूल उगे वहाँ फ़ूल खिलाए 

चाह ले राई पहाड़ करे वह चाहे पहाड़ को राई बनाए 
चाहे तो भीख मंगा दे गली गली चाहे तो वी ठकुराई दिलाए 
चाह ले वो दुर्योधन का घर त्याग दे साग विदूर के खाए,
चाह ले तो कुटिया में रहे चाहे स्वर्ण की लंका में आग लगाए।

प्यार की रीति निबाह दो प्यार मिले न मिले यूं निबाहने वाला।
रूप तुम्हारा समन्दर है दिल मेरा समन्दर थाहने वाला।
यौवन भार से देह झुकी इसे चाहिए कोई सम्हालने वाला 
चाह नही तुम्हें आज मेरी कल चाह रहेगी न चाहने वाला।!

पतिव्रत से ऊंचा राष्ट्र धर्म

पति धर्म से ऊपर 
पतिव्रत से ऊँचा राष्ट्रधर्म,
नारी यह समझे गूढ़ मर्म,
वह भरत जननि वह वीर प्रिया 
सब सोंच समझ कर रही कर्म 
वह देव विजयिनी कैकेयी दुविधा मेअश्रु बहाए ,
निर्णय लेना है अभी राम राजा हों या वन जाए।

वन के तपसी उन ऋषियों के 
तप व्रत भजनो का क्या होगा ?
सरवन की बूढ़ी माता के,
शापित वचनों का क्या होगा ?
क्या होंगे सपन  जटायु के,
नारद के श्राप कहाँ होंगे,
दिन प्रतिदिन कटते जाते माँ
शबरी के पाप कहाँ होगे ?
क्या होगा भक्ति भावना का भगवान ना यदि जा पाए ,
निर्णय लेना है अभी राम राजा हो या वन जाए ।

गंगा तट पर केवट बैठा होगा 
दर्शन अभिलाषा में,
राहें सुग्रीव देखता ही होगा,
प्रतिदिन इस आशा में,
संहार करेंगे रामचंद्र 
इस नीच अधर्मी बाली का 
रावण भी चाह रहा होगा 
उद्धार करें प्रभु पापी का 
उन सबकी चाह मरे मुझसे या फिर ममता मर जाए 
निर्णय ..........................  ........................।
जो धर्म एक क्षत्राणी का  
वह धर्म निभाना ही होगा,
निशप्रानित मानवता,
अमृत घट से नहलाना ही होगा,
रघुकुल की लाज बचाने में,
राजन को सद्गति पाने दूँ,
चारों दिशि राष्ट्र सुरक्षा में,
रघुनन्दन को बन जाने दूँ।
बलिदान बिना कब होती हैं रक्षित भू की सीमाएँ,
निर्णय ..........................  ........................।
सीमाओं पर पति और पुत्र,
कलियुग में कौन पठाएगा,
जब त्रेता सतयुग द्वापर,
कायरता की लीक बनाएगा,
दुनिया अनुसरण करेगी यह 
रघुकुल कायर कहलाएगा,
पति और पुत्र का मोह,
राष्ट्र की रक्षा को खा जाएगा।
वरना क्या सीखेंगी हमसे,
कल आने वाली माँयें।
निर्णय ..........................  ........................।
इतिहास कलंकित कर बैठी,
माटी में नाम मिला बैठी ,
पर देश भक्ति के वह 
ऊँचे सिंहासन सीधे जा बैठी,
ऐसे वलिदान देश हित में 
एक नारी ही दे सकती है,
नारी दुनिया की रचना से 
ना रुकती है ना थकती है।
दुनिया को अमृत बाँट रही पीकर विष की कुण्ठाएँ,
निर्णय .....................................................।

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

वह कौन है मेरी निगाहों में

वह कौन है मेरी निगाहों में ?
वह कौन है?
इन आँखों में पलते-पलते,
इक दिन यूँ ही चलते चलते,

टकरा गया मुझसे राहों में।,
वह कौन है ?

वह कौन भिगो जाता पलकें हौले हौले से मुस्काकर,
मेरे उदास होते आता आकर धीरे से दुलराकर,
क्षण भर को दूर चला जाता क्षण भर को आता बाँहों में,
वह कौन है?

वह कौन है जो ख़ुशबू भरकर महका जाता है स्वाँस स्वाँस,
कुछ पल को मेरे कमरे में आ करके कर जाता प्रवास,

देता है सजा पुण्य में कर देता है माफ़ गुनाहों में,
वह कौन है ?

मेरे कड़वे पन को पीकर हंस हँसकरके सब सह लेता है,
झरनों के संग जन्मा फिर भी मुझ  मरुथल में रह लेता है,

जीवन भर साथ निभाता  संग संग जाता  है क़ब्रगाहों में,
वह  कौन है ?

प्रियांशु गजेन्द्र

गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

सुबह छपे अखबार में

कहीं प्रशंसा कही से ताली
कहीं भरा दिल कहीं से ख़ाली 
मैंने इतनी उमर बिताली जैसे तैसे प्यार में।
रात रात भर तुमको गाया सुबह छपे अख़बार में।

पाँव बेचकर सफ़र ख़रीदा सफ़र बेचकर राहें,
जब खुद को मै बेंच चुका तो सबकी पड़ी निगाहें,
नींद बेचकर सपन ख़रीदे 
सपने बेच तबाही,
कागज बेंचे कलम ख़रीदी 
कलम बेचकर स्याही।
जीवन कई रंग में रंगा रंगों के व्यापार में,
रात रात भर तुमको गाया सुबह छपे अख़बार में।

कुछ गीतों से चित्र बनाए कुछ गीतों में रास रचा ली,
पनघट पनघट घूमे फिर भी अब तक अपनी प्यास बचा ली,
कुछ गीतों में हम खोए तो 
कुछ में दुनिया खोई,
कुछ गीतों में जब हम रोए ,
संग संग दुनिया रोई,
अब मुस्कानें बेच रहा हूँ आँसू के बाज़ार में,
रात रात भर तुमको गाया सुबह छपे अख़बार में।

तुम बोलो तुमने जीवन में क्या खोया क्या पाया ?
कौन पराया अपना हो गया अपना कौन पराया ?
कौन फ़ूल डाली से टूटा,
कौन खिला मधुवन में ?
किसके कंगन पहन के,
निकली हो पहले सावन में ?
किस ख़ुशबू से महक रही हो इस निष्ठुर संसार में ?
रात रात भर तुमको गाया सुबह छपे अख़बार में।

प्रियांशु गजेन्द्र

रविवार, 31 मई 2020

एक पल जो हमें भूलता ही न था

एक पल जो हमें भूलता ही न था,
भूल जाएगा यूँ भूलता ही नही।
दूर जाना ही था दूर जाता तो पर 
दूर जाएगा यूँ भूलता ही नहीं।

रह गयी है अयोध्या भरत के बिना 
जानकी के बिना राम वनवास है।
पार्थ को त्याग रण में दिया कृष्ण ने,
शास्त्र बिन व्यर्थ का शस्त्र अभ्यास है।

दुख में दुःख ना उठाता तो दुःख ही ना था
मुस्कुराएगा यूँ भूलता ही नहीं ।

श्याम ने कब कहा था कोई राधिका,
या कि मीरा करे मात्र उनका भजन,
तीर्थ उपवास व्रत अर्चना के बिना,
जिनको रहना था वे देवता थे मगन,

भक्त भगवान की भक्ति की क़ीमतें 
कुछ चुकाएगा यूँ भूलता ही नहीं।

पंछियों से कहा छोड़ आकाश दें,
मछलियों से कहा छोड़ दें वे नदी।
भूत सर पर चढ़ा है नयी चाह का 
ख़ाक में जाएँ रिश्ते व नेकी बदी,

सवैये (लोक की रीति)

आप सुनो 

लोक की रीति में हूँ उलझा मन चाहे बहूँ पै बहा नहिं जाए 
आप सुनो तो कहूँ मन की न सुनो यदि आप कहा नहि जाए,
सांप छछून्दर की गति है न कहूँ तो कहे से रहा नहिं जाए।
बोल किसी का चुभा इतना इतना इतना इतना कि सहा नहि जाए 

रंग लगा गयी गाल पे जो हम चाह के भी तो छुड़ा नहि पाए 
फ़ूल की गंध में लीन रहे बस फ़ूल की गंध चुरा नहि पाए 
हाथ हिला गए आप चले हम चाह के हाथ हिला नहिं पाए 
नैन से दूर गए तुम तो किसी और से नैन मिला नहि पाए 


पत्र पठाए कई सब लौट के आए तुम्हारा पता नही पाए 
पाँव चले कई मील चले पर ठीक कोई रस्ता नहि पाए 
सूरज ही ना मिला ढलता हुआ चाँद  नहीं उगता हुआ पाए 
प्यार किया तुमसे तुमसे पर बात यही कि बता नहि पाए।


आए तो आप बुलाए नही जो बुलाए भी तो हम आ नहि पाए 
जा तो रहे थे कि जाएँ चले जब जाने लगे तब जा नहि पाए 
एक तुम्हीं न मिली मुझको हम और भला अब क्या नहिं पाए 
प्यार मिला दुनिया का हमें हम ही अपनी दुनिया नहि पाए 

प्यार बड़ा महँगा था बाज़ार में और कहीं सस्ता नहि पाए
प्यार किया जिसने उसको हम तो न कभी हँसता हुआ पाए 
बात यही इतनी जितना समझे उतना समझा नहि पाए,
आग में पानी मिले कितना पर पानी को आग कहा नहि जाए,

बाग़ को ताल बता न सके हम ताल को बाग़ बता नहि पाए 
काव्य धरा पर घूम रहे हम काव्य आकाश में जा नहिं पाए 
चाह नही सुनने की जहाँ वहाँ चाह के भी हम गा नहि पाए 
आप बुला न सके मुझको न बुला सके आप तो आ नहि पाए 

राह न यूँ बदलो अपनी हम यूँ नही  तेरी राह में आए,
बाँह न जाने खुली कितनी पर एक तुम्हारी ही बाँह में आए,
थाहते थाहते सिन्धु कई अब नैन के सिन्धु अथाह में आए।
नैन हटे लगा आम की छाँह को छोड़ बबूल की छाँह में आए।


बालपना गुज़रा है अभाव में साहब सेठ नही बन पाए 
और जवान हुए तब रूप शिकारियों ने खूब जाल बिछाये 
चोर मिले चितचोर मिले पर चोरी में जा न सके हैं चुराए 
हाथ तुम्हारे लगे हम वो जो कभी भी किसी के भी हाथ न आये ।

मैं न कभी मिल पाता  तुम्हें मिलवाए गये हैं तभी मिल पाए ।
सत्य यही है कि ईश्वर चाह रहा था तुम्हें मुझसे चहवाये।
चाह ले दो दिल दूर करे वह चाह ले दो बिछड़ों को मिलाए।
चाह उसी की गजेन्द्र जहाँ पर शूल उगे वहाँ फ़ूल खिलाए 

चाह ले राई पहाड़ करे वह चाहे पहाड़ को राई बनाए 
चाहे तो भीख मंगा दे गली गली चाहे तो वी ठकुराई दिलाए 
चाह ले वो दुर्योधन का घर त्याग दे साग विदूर के खाए,
चाह ले तो कुटिया में रहे चाहे स्वर्ण की लंका में आग लगाए।

प्यार की रीति निबाह दो प्यार मिले न मिले यूं निबाहने वाला।
रूप तुम्हारा समन्दर है दिल मेरा समन्दर थाहने वाला।
यौवन भार से देह झुकी इसे चाहिए कोई सम्हालने वाला 
चाह नही तुम्हें आज मेरी कल चाह रहेगी न चाहने वाला।

तुम नहीं हो तो

तुम नही हो तो तुम्हारी याद साथी है 
याद ऐसी जो तुम्हारे बाद साथी है।

मै अकेला कब रहा तुम थे हमारे साथ मन में 
सामने जब थे तो थे नहीं थे तो थे जज्बात मन में, 
प्यार के आगे भला क्या टिक सकेंगी दूरियां भी
कुछ नही रहता तो रहती है तुम्हारी बात मन में। 
मरहमों से क्या गिला आघात साथी है, 
तुम नहीं हो तो तुम्हारी......................।

विरह में जलकर भी हमने बस तुम्हार ताप देखा, 
बस तुम्हें देखा किसी को देखने में पाप देखा 
प्यार में मर मर के जीना कोई क्या दिखलायेगा 
जो भी देखा प्यार करके मैने अपने आप देखा। 
स्वर नहीं तो मौन का संवाद साथी है।
तुम नहीं हो तो तुम्हारी......................।

तन भले है दूर कितना मन मे अब भी चित्र तेरा,
आज इन टेंसू के फूलों ने जिसे फिर फिर उकेरा 
ओ हवा रुक जा तनिक उपहार दे देना उसे कुछ 
स्वांस की खूशबू से खुश हो जाएगा वह मित्र मेरा 
और कहना उम्र भर अवसाद साथी है ।
तुम नही हो तो तुम्हारी याद.......।

जिसको गीत सुनाने

जिसको गीत सुनाने को मै,
रात रात भर भटक रहा हूँ,
पता नही किस राजभवन में 
सुख की नींद सो रही होगी,

हवा उधर से इधर आ रही और उधर भी जाती होगी,
मैने याद किया है जिसको याद उसे भी आती होगी,
जिसकी याद भुलाने खातिर,
हम मथुरा से गये द्वारिका,
पता नहीं किस वृन्दावन में,
वह उम्मीद बो रही होगी।

जाने किसके कुटिल अधर ने रंग अधर का लूटा होगा
कसमसाया होगा कितना पर कंगन अभी न टूटा होगा,
जिस पर रंग चढाने खातिर,
सब सांसें हो गयी होलिका,
पता नही किस आलिंगन में 
वह बकरीद हो रही होगी

जाने किसकी क्रूर उंगलियां खेल रही होंगी अलकों से,
जिन्हें संवारा करते थे हम अपनी इन भीगी पलकों से,
जिसको पास बुलाने खातिर
हम ही खुद से दूर हो गए,
पता नही किस आवाहन में,
सुनकर गीत रो रही होगी।
प्रियान्शु गजेन्द्र

जगमग दिन

जगमग दिन रोशन रहे रात,
घर उतरे तारों की बारात,
बस इतने तक तो रहा साथ आगे पथ एक नही तो क्या?
सारा जग साथ तुम्हारे है बस मैं ही एक नहीं तो क्या?

पर्वत निश्चल रह जाते हैं अक्सर नदियाँ बह जाती हैं,
फूलो का डाली से विछोह गुमसुम बगिया सह जाती है
क्या हुआ कलाई को उनकी कंगन स्वीकार नही मेरे,
क्या हुआ अगर अरमानों की चूड़ियाँ रखी रह जाती हैं?
अब तक तो सब स्वीकार किया,
इतने दिन तक तो प्यार दिया,
माटी तो चंदन हुई अगर होगा अभिषेक नही तो क्या ?
सारा जग .............................................?

इतने दिन प्यार दिया तुमने है बहुत बहुत आभार प्रिये,
मधुमासों को मिलना ही था यह पतझर का उपहार प्रिये,
नीरस पतझर के हाथों का जीवन भी एक खिलौना था,
दुख है इन घायल हाथों से मैं कर न सका शृंगार प्रिये,
नभ से तारे मैं ला सका,
इसलिए तुम्हें मैं पा न सका,
माथा तो लाए चौखट तक यदि पाए टेक नही तो क्या ?
सारा जग .............................................?

अपना सब कुछ देकर बैठे फिर भी तुमको हम पा न सके,
तुम गीत समय का थी तुमको नीरस अधरों पर ला न सके,
संसार भले कुछ भी समझे जो समझे उसे समझने दो,
जो तुम समझे वह था ही नही जो था वह हम समझा न सके।
जो था वह था अब जाने दो,
अब स्वर्णिम संध्या आने दो,
थकती आँखें बुझती आँखें पाई यदि देख नहीं तो क्या ?
सारा जग ..........….....................................?

कब रची इतिहास

किस तरह गाऊँ समय की वेदनाएँ,
मर चुकी हों जब सभी संवेदनाएं।
कब लिखा इतिहास ने उनकी कहानी,
खो गयी जिनकी निशानी,

खेल लहरों से भँवर में खो गए,
देश की नौका चलाकर सो गए,
वन जो खाण्डव इन्द्रप्रस्थी बन गए तो 
शक्तिशाली कौरवों के हो गये।

पांडवों को है उमर वन में बितानी।
खो गयी जिनकी निशानी।

भाग्य से यूँ कर्म की दूरी मिली ,
स्वर्ग रच डाला न मज़दूरी मिली,
मौत भी आयी तो तब जब मर चुके थे,
ज़िन्दगी को ऐसी मजबूरी मिली।

राजपथ पर है लहू नयनों में पानी।
खो गयी जिनकी निशानी।

घोषणाएँ मार्ग में सोती मिली,
मर गयी जब भूख तब रोटी मिली,
देह जब निर्वस्त्र होकर गिर गयी तो,
राजधानी से नयी धोती मिली।

हो गए भिक्षुक समय के साथ दानी,
खो गयी जिनकी निशानी ।



गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

मै आंसू बेंच रहा हूं

मै आँसू बेंच रहा हूँ 
है जग में कोई ख़रीदार जो ले ले और मुझे दे दे,
मुस्कान अधर पर दो पल की,
क्या है कोई ?

आए प्राणों को ले निकाल उनके इन मेरे प्राणों से,
पल भर को नदिया दूर करे अगमित उत्ताल पहाड़ों से,
क्या है कोई जो हटा सके बरसों से जमी हुई पीड़ा,
छाती से अचल हिमाचल की 
क्या है कोई ?

आँखों से दूर करे चेहरा,पहचान मिटा दे ख़्वाबों से,
पौधों से अलग करे माटी,ख़ुशबू को अलग गुलाबों से,
क्या है कोई जो बरसों से रुनझुन सुनते इन कानो से
आवाज मिटा दे पायल की,
क्या है कोई?

सपनो के अतल समन्दर से यादों के मोती ले निकाल,
मछली को जल से दूर करे जल में संयम का जाल डाल,
क्या है कोई इस दुनिया में जो तपती विरह दोपहरी में,
बिसरा दे सुधियाँ आँचल की,
क्या है कोई ?

प्रियांशु गजेन्द्र

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

पांव में पीर उठती रही

पाँव में पीर उठती रही पर उंगलियों में दवा दी गयी,
आग जब भी लगी मेरे घर में खिड़कियों से हवा दी गयी

वक़्त नाज़ुक है हालात नाज़ुक,
उनसे मत आसरा कीजिएगा,
हाथ में जो उठाए हैं पत्थर,
उनसे क्या मशवरा कीजिएगा?

मेरी आवाज़ थी बस मोहब्बत सिसकियों में दबा दी गयी
आग जब जब ...............................................।

हो रहे लोग अपने पराए,
फ़ूल मधुमास में मर रहे हैं।
जो है करना नही कर रहे क्यों
जो न करना है वह कर रहे हैं।

आग झुलसी किताबों से लाकर बस्तियों में लगा दी गयी।
आग जब जब ...............................................।

तुम भी हिन्दू मुसलमान हो क्या,
पढ़ न पाए जो दिल की कहानी,
एक जम जम की ख़ातिर लड़ा तो 
दूसरा लड़ गया कहके पानी।

जल तो जल है मेरी बात लेकिन चिट्ठियों में छुपा दी गयी ।
आग जब जब ...........................................।

प्रियांशु गजेन्द्र

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019

किस कहानी में खोए हुए थेके

किसका किरदार हम पढ़ रहे थे,
किस कहानी में खोए थे ?
नैन इतने भी मासूम थे क्या,
जिनके पानी में खोए हुए थे?

वे नशीले नयन और होंगे,
जिनमे ढलते हैं हर रात प्याले 
बाँह भी और ही होगी अब जो,
उम्र भर की थकन को सम्हाले।
ऐसी मिलती कहां अब कलाई
प्यार के जिनमें कंगन खनकते,
प्यार भी प्यार ही रह गया क्या 
कर रहे जब से व्यापार वाले?

कातिलों के निशाने पे थे पर,
हम निशानी में खोए हुए थे।

तुमको देनी थी जो दे न पाया,
चिट्ठियां आज वे सब जला दी,
देने वाले की शायद कमी थी,
मुझको चाहत मुझे ही वफा दी।
प्यार मैंने निभाया तो ऐसे,
वैसे ईश्वर न कोई निभाए।
खुद का अपराध खुद की अदालत
खुद गवाही दी खुद को सजा दी,

उम्र से पहले आया बुढ़ापा,
हम जवानी में खोए हुए थे,

पांव पत्थर जहां छील देते ,
फायदा क्या चलें उस डगर पर।
मन है ख़ाली हुई जेब ख़ाली
बोझ हूं अब तुम्हारे शहर पर,
दोष सागर का कोई नहीं था,
ना ही पतवार थी इसमें दोषी।
नाव को एक दिन डूबना है,
जब नियंत्रण न हो हर लहर पर,

तट पे तूफान आया था तब हम,
राजधानी में खोए हुए थे।